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विजयवाड़ा से 25 किमी ऊपर: भारत ने रचा नियर-स्पेस इतिहास, दुनिया के पांच देशों की लीग में शामिल

VISTA प्लेटफॉर्म एक साथ कई ग्राहकों को सेवा देकर नियर-स्पेस तक पहुंच की लागत घटाता है और स्टार्टअप्स के लिए नई संभावनाएं खोलता है.

हैदराबाद: विजयवाड़ा से उड़ान भरकर भारत ने अंतरिक्ष और धरती के बीच की उस मुकाम को जीत लिया है, जिसे दुनिया के महज पांच देश ही जीत पाए हैं. रेड बैलून एयरोस्पेस ने मिशन SANA के जरिए देश का पहला स्वदेशी स्ट्रेटोस्फेरिक सुपर-प्रेशर बैलून सफलतापूर्वक लॉन्च करके इतिहास रच दिया. यह महज एक बैलून उड़ान नहीं थी – यह भारत की संप्रभु क्षमता का ऐलान था.

नियर-स्पेस क्यों है इतना अहम?

आजकल नियर-स्पेस यानी पृथ्वी से 20 से 40 किलोमीटर की ऊंचाई वाला स्ट्रेटोस्फेरिक क्षेत्र, तेजी से एक रणनीतिक बुनियादी ढांचे के रूप में पहचाना जा रहा है. यह वो परत है, जहां पारंपरिक विमान नहीं पहुंच सकते और जहां सैटेलाइट किसी एक क्षेत्र पर लंबे समय तक टिके नहीं रह सकते. यही वजह है कि अमेरिका, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रहे हैं.

नियर-स्पेस से बेहद कम लागत में संचार, आपदा प्रबंधन, निगरानी और पर्यावरण निगरानी समेत कई ऐसे क्षेत्र हतर तरीके से संचालित किए जा सकते हैं. भारत अब इस दौड़ में शामिल हो चुका है.

मिशन SANA – एक मंच, सात साझेदार

मिशन SANA की सबसे खास बात यह रही कि इसने एक साथ सात राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों बिजनेस पेलोड को एक ही फ्लाइट में सफलतापूर्वक संचालित किया. यह भारत का पहला व्यावसायिक नियर-स्पेस प्लेटफॉर्म बन गया है, जिसमें सब कुछ एक साथ जुड़ा हुआ है

रेड बैलून एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और सीईओ सी.वी.एस. किरण ने बताया कि यह उपलब्धि सिर्फ तकनीकी सफलता नहीं है. यह साबित करती है कि भारत अब वैश्विक नियर-स्पेस बाजार में सक्रिय भागीदारी के लिए पूरी तरह तैयार है. कंपनी ने 2025 में स्थापना के बाद महज आठ महीनों में डेवलपमेंट से व्यावसायिक उड़ान तक का सफर तय कर लिया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुश्किल है.

सुपर-प्रेशर बैलून – साधारण से कितना अलग?

किरण ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक हाई-एल्टीट्यूड बैलून कुछ घंटों में उठते, बहते और उतर जाते हैं, क्योंकि वे स्ट्रेटोस्फेयर की दिन-रात की तीव्र तापमान उथल-पुथल को झेल नहीं पाते. लेकिन सुपर-प्रेशर बैलून (SPB) पूरी तरह से अलग तकनीक पर काम करता है. यह हफ्तों या महीनों तक स्थिर ऊंचाई बनाए रख सकता है.

इसके लिए एडवांस कंटेंट इंजीनियरिंग, प्रेशर मैनेजमेंट, संरचनात्मक मजबूती, टेलीमेट्री, नेविगेशन और रिकवरी सिस्टम – सबकुछ को एक साथ काम करना पड़ता है. रेड बैलून एयरोस्पेस ने यह पूरी वैल्यू चेन खुद अपने बलबूते पर डेवलप की है. इसके लिए उसे किसी बाहरी चीजों पर निर्भर नहीं होना पड़ा. यही कारण है कि वो इतने कम समय में इस मुकाम तक पहुंच पाए.

विस्टा प्लेटफॉर्म – आकाश में एक मीनार

रेड बैलून का VISTA प्लेटफॉर्म धरती से करीब 25 किलोमीटर ऊपर एक “आकाशीय मीनार” की तरह काम करता है. यह दूरसंचार रिले, पृथ्वी अवलोकन, आपदा प्रबंधन और दूरदराज के इलाकों में कनेक्टिविटी के लिए एकसाथ इस्तेमाल किया जा सकता है.

सह-संस्थापक और COO सिरीश पल्लीकोंडा ने बताया कि एक ही VISTA मिशन से कई ग्राहकों को एक साथ सर्विस दी जा सकती है. यह रिडशेयर मॉडल लागत घटाता है, समय बचाता है और स्टार्टअप्स और शोध संस्थानों के लिए नियर-स्पेस तक पहुंच आसान बनाता है. सैटेलाइट की तुलना में इसे किसी खास क्षेत्र में, कम समय में तैनात किया सकता है और जरूरत खत्म होने पर वापस भी लाया जा सकता है.

दूरसंचार और आपदा प्रबंधन

किरण के मुताबिक दूरसंचार और आपदा प्रबंधन – दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहां इस तकनीक का सबसे पहला और सबसे बड़ा असर दिखेगा. भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी की काफी कमी है और आपदा के समय जमीनी बुनियादी स्ट्रक्चर अक्सर ध्वस्त हो जाता है. ऐसे में VISTA जैसा प्लेटफॉर्म पूरे राज्य को कवर करते हुए संचार और निगरानी दोनों एकसाथ प्रदान कर सकता है.

इसके बाद कृषि और पर्यावरण निगरानी के लिए पृथ्वी अवलोकन में भी यह अहम भूमिका निभाएगा. इसकी एडवांस इमेजिंग क्षमता और लंबे समय तक एक क्षेत्र पर टिके रहने की खूबी इसे कुछ मामलों में सैटेलाइट्स से भी बेहतर विकल्प बनाती है.

किरण ने जोर देकर कहा कि अब हमारे देश को एक स्पष्ट नीतिगत स्ट्रक्चर की जरूरत है. जहां स्ट्रेटोस्फेरिक परिचालन के लिए नियामक व्यवस्था हो, एयरस्पेस मैनेज सिस्टम हो और सरकार नियर-स्पेस को प्रयोगशाला की जगह बुनियादी ढांचे के रूप में देखे. मिशन SANA सिर्फ एक शुरुआत है. अगर भारत इस गति को बनाए रखता है, तो आने वाले सालों में नियर-स्पेस प्लेटफॉर्म सैटेलाइट की तरह ही देश की संचार, रक्षा और पर्यावरण निगरानी सिस्टम की रीढ़ बन सकते हैं.

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