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उत्तराखंड में वनाग्नि का कहर, गढ़वाल मंडल में रिकॉर्ड घटनाएं हुईं दर्ज, फिलहाल बारिश ने दी राहत

उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन 15 फरवरी से शुरू होकर 15 जून तक चलता है,गढ़वाल में 29 अप्रैल तक वनाग्नि की 145 घटनाएं दर्ज हुईं

देहरादून: उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इस साल वनाग्नि ने तय समय से पहले ही भयावह रूप लेना शुरू कर दिया है. अप्रैल के तीसरे सप्ताह में ही आग की घटनाओं ने बीते वर्षों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया था. इससे जंगलों पर बढ़ते संकट की तस्वीर साफ दिखने लगी है. वन विभाग के अनुसार अब तक वनाग्नि की 145 से अधिक घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं.

वनाग्नि बनी मुसीबत: वनाग्नि की इन 145 घटनाओं में आरक्षित और सिविल दोनों वन क्षेत्र प्रभावित हुए हैं. करीब 96.08 हेक्टेयर जंगल जलकर खाक हो चुके हैं. पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग 40 प्रतिशत अधिक जंगलों का नुकसान हुआ है, जो संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों का असर अब अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है. जंगलों में सूखी पत्तियां और बढ़ती गर्मी आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. अभी तो अप्रैल का महीना ही बीता है जबकि पूरी गर्मी अभी बाकी है.

गढ़वाल में सबसे ज्यादा असर, कई वन प्रभाग बने हॉटस्पॉट: गढ़वाल क्षेत्र इस समय वनाग्नि का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है. यहां अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक ही वनाग्नि की 100 से अधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं. बदरीनाथ वन प्रभाग में सर्वाधिक आग की घटनाएं दर्ज हुई हैं. रुद्रप्रयाग सहित अन्य क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर जंगल प्रभावित हुए हैं. यहां आरक्षित वनों के साथ-साथ सिविल वनों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ रहा है. आग के कारण वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं. वनाग्नि से घबराकर और बचने के लिए वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं. लगातार बढ़ते तापमान, नमी की कमी और कई मामलों में मानवीय लापरवाही इस संकट को और गंभीर बना रही है. इससे न केवल जंगलों की हरियाली घट रही है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ रहा है.
29 अप्रैल तक के वनाग्नि के आंकड़े: वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 29 अप्रैल तक वनाग्नि की 145 घटनाएं हो चुकी हैं. इसमें से 81 आग लगने की घटनाएं आरक्षित वन क्षेत्रों में हुई हैं. 64 सिविल वनों मे 96.08 हेक्टेअर क्षेत्रफल में बेशकीमती जंगल जल चुके हैं. अप्रैल महीने में 15 तारीख के बाद वनाग्नि की 110 घटनाएं अकेले गढ़वाल में घटी हैं. रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में वनाग्नि की कुल 30 घटनाओं में से 10 आरक्षित और 20 सिविल वनों में हुईं. बदरीनाथ वन प्रभाग में सबसे अधिक 41 वनाग्नि की घटनाएं हो चुकी हैं, जिससे करीब 65 हेक्टेयर में जंगल जल गए.
वायु गुणवत्ता पर असर, ब्लैक कार्बन बढ़ा रहा तापमान: वनाग्नि का प्रभाव अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वायु गुणवत्ता पर भी साफ नजर आने लगा है. पहाड़ों की स्वच्छ हवा अब धुएं और प्रदूषण से प्रभावित हो रही है, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक कई जगहों पर चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है. आग से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन वातावरण में घुलकर तापमान को और बढ़ा रहा है, जिससे गर्मी का असर और तेज हो रहा है. इससे सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है और आम लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैक कार्बन का असर हिमालयी ग्लेशियरों पर भी पड़ सकता है, जिससे बर्फ के तेजी से पिघलने का खतरा बढ़ जाता है. अगर इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या भविष्य में और विकराल रूप ले सकती है.

बारिश से मिली राहत लेकिन खतरा अभी टला नहीं: इसी बीच आज प्रदेश के कई हिस्सों में हुई बारिश ने वनाग्नि की घटनाओं पर फिलहाल ब्रेक लगा दिया है. हल्की से मध्यम बारिश के कारण आग के फैलाव में कमी आई है. तापमान में भी गिरावट दर्ज की गई है. मौसम विभाग का अनुमान है कि आने वाले कुछ दिनों तक प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रुक-रुक कर बारिश जारी रह सकती है, जिससे आग पर काबू पाने में मदद मिलेगी. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही है, क्योंकि मौसम के शुष्क होते ही आग की घटनाएं फिर बढ़ सकती हैं. ऐसे में प्रशासन और वन विभाग लगातार निगरानी बनाए हुए हैं.

सीसीएफ का बयान: सीसीएफ वन अग्नि सुशांत पटनायक का कहना है कि-

इस वर्ष तापमान में तेजी से बढ़ोत्तरी और लंबे समय तक शुष्क मौसम रहने के कारण वनाग्नि की घटनाओं में बढ़ोत्तरी देखी गई है. विभाग लगातार निगरानी कर रहा है और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष टीमें तैनात की गई हैं. जो भी राज्य में बड़ी आग की घटनाएं हुई हैं, उन्हें हमने रिकॉर्ड टाइम में बुझाया है.
-सुशांत पटनायक, सीसीएफ वन अग्नि-

पटनायक का कहना है कि बारिश से कुछ राहत जरूर मिलेगी. इसके बावजूद हम अलर्ट हैं. जो भी अलर्ट मिल रहा है, उसके मुताबिक टीमें लगी हैं. साथ ही लोगों से भी अपील है कि वे जंगलों में आग लगने से रोकने में सहयोग करें.

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